श्रुति गंगवार
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भाषण

हिंदू सम्मेलन — संघ के 100 वर्ष

Hindu Sammelan — 100 years of the Sangh

“जहाँ मातृ शक्ति सक्रिय होती है, वहाँ परिवर्तन वास करता है।”

कार्यक्रम विवरण

अवसर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर हिंदू सम्मेलन
विषय
पंच परिवर्तन
स्थान
बहेड़ी, बरेली
तिथि
25 जनवरी 2026

संघ के 100 वर्ष
संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने का यह पावन अवसर अत्यंत गौरव का विषय है। नागपुर में एक छोटी-सी शाखा से प्रारंभ हुआ संघ का यह कार्य आज संपूर्ण भारतवर्ष और विश्व में फैल चुका है। आज संघ के स्वयंसेवक देश-विदेश के कोने-कोने में निःस्वार्थ भाव से राष्ट्र सेवा में संलग्न हैं।

पवित्र हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति की रक्षा, हिंदू समाज के संरक्षण तथा हिंदू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के लिए पूज्य डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने इस महान संगठन की नींव रखी। असंख्य स्वयंसेवकों के त्याग, तपस्या और अथक परिश्रम के कारण ही संघ आज इस विराट स्वरूप तक पहुँचा है। उन सभी स्वयंसेवकों को हम शत-शत नमन करते हैं।

शताब्दी वर्ष में भी संघ का संकल्प स्पष्ट है — समाज के बीच जाकर समाज को जागृत करना और समाज के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना। इन्हीं विचारों को केंद्र में रखते हुए इस हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया है।

एक शताब्दी पूर्व जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई, तब देश की परिस्थितियाँ और संघर्ष के स्वरूप भिन्न थे। आज जब हम 2047 तक विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं, तब आज के समय की चुनौतियाँ भी नई हैं। संघ ने न केवल आज की इन चुनौतियों को पहचाना है, बल्कि उन्हीं के अनुरूप अपने कार्य की दिशा और रोडमैप भी तय किया है।

जब हम समाज के सदस्य के रूप में आत्मचिंतन (introspect) करते हैं, तो हमें जीवन के हर क्षेत्र में अनेक प्रकार की परिस्थितियाँ दिखाई देती हैं। चाहे व्यक्तिगत जीवन हो, सामाजिक क्षेत्र हो या राष्ट्रीय — किसी न किसी रूप में समस्याओं और मुद्दों की चर्चा चारों ओर सुनाई देती है। परंतु केवल समस्याओं की चर्चा करते रहना समाधान नहीं है। While we discuss and talk about problems, we also need to talk about constructive solutions and their implementation.

क्योंकि जो समस्याएँ हमें अपने आसपास दिखाई देती हैं, उनका समाधान किसी बाहरी शक्ति के पास नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर और हमारे समाज की सामूहिक चेतना में है।

इसी भाव को केंद्र में रखते हुए संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर पंच परिवर्तन को मुख्य विषय के रूप में स्वीकार किया गया है। यह केवल विचार नहीं, बल्कि समाज के साथ मिलकर परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प है।

ये जो पंच परिवर्तन, यानी पाँच बातें हैं — सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, स्वबोध, पर्यावरण और नागरिक कर्तव्य — इनके माध्यम से समाज को सकारात्मक दिशा में ले जाने में मातृ शक्ति की अग्रणी भूमिका रही है।

सम्मेलन में उपस्थित जनसमूह
सम्मेलन में उपस्थित जनसमूह

मेरा मानना है कि जहाँ मातृ शक्ति सक्रिय होती है, वहाँ परिवर्तन वास करता है।

सामाजिक समरसता अर्थात ऐसा समाज जहाँ ऊँच-नीच न हो, जहाँ जाति, वर्ग और भेदभाव की दीवारें गिरें, और जहाँ हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले; जहाँ सामाजिक सद्भाव (social harmony) हो, लोग एक-दूसरे के प्रति जुड़ाव महसूस करें और एक-दूसरे की ताक़त बनें।

आज राष्ट्र के सामने ऐसे संकट खड़े हो रहे हैं जो हमारी एकता, हमारी संस्कृति और हमारी सुरक्षा पर सीधा प्रहार कर रहे हैं। भारत की आत्मा हमेशा विविधता में एकता ही रही है, और इसलिए हमें इस सूत्र को मज़बूती देनी है।

माँ ही वह पहली शिक्षिका है जो बिना किसी भेदभाव के संस्कार बोती है। वह सिखाती है साथ बैठना, साथ खाना, साथ चलना और साथ आगे बढ़ना — समाज एक परिवार है। यही संस्कार जब घर से निकलकर समाज में जाते हैं, तो समरस समाज का निर्माण होता है। मेरी माताओं, आज यह ज़िम्मेदारी आपकी है। जब आपके बच्चे स्कूल जाएँ, तो उन्हें यह सिखाकर भेजें कि ‘बेटा, तुम्हारा मित्र किस जाति का है यह मत देखना, उसका मन कैसा है यह देखना।’ समरसता व्यवहार से आएगी, रोज़मर्रा के छोटे-छोटे बदलावों से आएगी।

परिवर्तन का दूसरा और निर्णायक स्तंभ है — कुटुंब प्रबोधन। यदि परिवार सशक्त है, तो समाज अपने आप सशक्त होता है। परिवार भारतीय सभ्यता की नींव है। हमें विकसित होना है, तरक़्क़ी करनी है, लेकिन इसके साथ ही अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने मूल्यों से जुड़े रहना भी अत्यंत आवश्यक है।

परिवार के मूल्य — बड़ों का सम्मान, नारी शक्ति का आदर, नौजवानों में संस्कार, अपने परिवार के प्रति दायित्व — ये सभी हमें समझने के साथ-साथ निभाने भी होंगे। परिवार में सकारात्मक सोच लाने में माँ, जो परिवार की आत्मा है, एक अहम भूमिका निभाती है।

आज का कटु सत्य यह है कि सुविधाएँ बढ़ रही हैं, लेकिन संवेदनाएँ सिकुड़ रही हैं। घरों में संवाद मौन होता जा रहा है। ऐसे समय में परिवार में संवाद, संयम और समर्पण की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ गई है।

टेक्नोलॉजी का उपयोग हमें दुनिया से जोड़ने के लिए होना चाहिए, न कि अपने परिवार से दूर करने के लिए। कम से कम एक घंटे के लिए रोज़ाना परिवार के साथ बैठें। भोजन के समय या किसी अन्य कार्य के दौरान खुलकर चर्चा करें — दिन कैसा गया, किसी समसामयिक विषय पर विचार-विमर्श करें, या साथ में कोई रचनात्मक कार्य करें।

भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि
भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि

आज एकल परिवार (Nuclear Family) बन गए हैं और व्यस्त जीवनशैली के कारण आपस में दूरी बढ़ गई है। ऐसे में यह और भी आवश्यक है कि हम अपने परिवार के लिए समय निकालें, खुला संवाद करें और एक-दूसरे की भावनाओं को समझें।

याद रखिए, परिवार में संवाद केवल परंपरा नहीं है, बल्कि संस्कारों और मूल्यों की सुरक्षा की सबसे मज़बूत नींव है। यही वह साधन है जो हमें आज जोड़ता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारे परिवार और समाज को मज़बूत बनाता है।

अपने बच्चों को संस्कार (Values) दीजिए, संसाधन (Valuables) तो वे स्वयं कमा लेंगे।

स्वदेशी और स्वबोध का अर्थ है — आत्मनिर्भर होना, अपनी मेहनत और क्षमताओं पर भरोसा रखना, और अपने देश तथा देश में निर्मित वस्तुओं पर गर्व करना।

यह मानसिकता और दृष्टिकोण में परिवर्तन है। जब तक हम विदेशी वस्तुओं और आदतों को श्रेष्ठ मानते रहेंगे, तब तक आत्मनिर्भरता केवल कहने की बात तक सीमित रहेगी। स्वबोध हमें गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर अपनी विरासत, भाषा, संस्कृति और मूल्यों पर गर्व करना सिखाता है।

“वोकल फॉर लोकल” को केवल अभियान न समझें, इसे जीवन का संकल्प बनाएँ। अपने दैनिक जीवन में हम जो भी चीज़ें ख़रीदते हैं, उनमें देशी उत्पादों को प्राथमिकता दें। जब हम अपने देश में निर्मित उत्पादों को प्राथमिकता देंगे, तो देश की अर्थव्यवस्था भी सशक्त होगी, और इसका सीधा संबंध हमारे देश की GDP से है।

स्थानीय उत्पादों (Local Goods) को अपनाने और उन्हें बढ़ावा देने में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में ऐसी कई महिला उद्यमी हैं जिन्होंने न केवल स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाया है, बल्कि हज़ारों अन्य महिलाओं को रोज़गार भी दिया है।

चौथी महत्वपूर्ण बात है — पर्यावरण की चिंता। पर्यावरण की रक्षा हमारे वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह पूरी मानवता के भविष्य से जुड़ा है, और इसकी शुरुआत अपने घर से ही करनी होगी। हमें छोटे-छोटे कदम उठाने होंगे — पानी की बचत करना, सिंगल यूज़ प्लास्टिक का उपयोग न करना, पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना। हमें यह हमेशा याद रखना होगा कि प्रकृति की रक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारा कर्तव्य है।

मातृ शक्ति के साथ
मातृ शक्ति के साथ

सरकार द्वारा चलाए जा रहे जल संरक्षण, ग्रीन एनर्जी और क्लीन एनर्जी जैसे अभियान इसी दिशा में हैं। ये कदम न केवल हमारे पर्यावरण को सुरक्षित रखेंगे, बल्कि 2047 तक विकसित भारत के निर्माण की नींव भी मज़बूत करेंगे।

साथियों, हमें गौरा देवी से प्रेरणा लेनी चाहिए — एक साधारण महिला, जिन्होंने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने जीवन को भी जोखिम में डाला। उन्हीं के साहस और लगन ने 1974 में चिपको आंदोलन को नई ऊर्जा दी, जो आज भी पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। हमारा कर्तव्य है — प्रकृति का संरक्षण करना और अपने घर तथा समाज को हरियाली और स्वच्छता से भरपूर बनाना।

नागरिक कर्तव्य — पंच परिवर्तन का पाँचवाँ स्तंभ है, जो हमें आत्ममंथन कराता है: मैं कौन हूँ और मेरा दायित्व क्या है। नागरिक कर्तव्य का अर्थ है — कर्तव्य की भावना, अपने नागरिक दायित्व का बोध।

आज हम बड़े ज़ोर से कहते हैं — “हमें हमारे अधिकार चाहिए।” लेकिन उतनी ही दृढ़ता से हमें कहना चाहिए — “हम अपने कर्तव्य निभाएँगे।” अधिकार माँगने से पहले कर्तव्य निभाना — यही सशक्त नागरिक की पहचान है।

यदि अधिकार हमें शक्ति देते हैं, तो कर्तव्य हमें ज़िम्मेदारी सिखाते हैं।

स्वच्छता का पालन, देश की संपत्ति का सम्मान, नियम और क़ानूनों का पालन — यही हमारे संविधान की भावना है और हमें इसे निरंतर सशक्त बनाना है।

यह सब किसी डर या भय से नहीं, बल्कि कर्तव्य-बोध और संस्कार से होना चाहिए। और इस कर्तव्य-बोध की सबसे पहली पाठशाला है — हमारा घर, और पहली शिक्षिका — हमारी माँ।

हमारा कर्तव्य है कि हम अपने बच्चों को अनुशासित नागरिक बनाएँ — यह सब देश सेवा है।

सम्मेलन में सहभागिता
सम्मेलन में सहभागिता

ये 'पंच परिवर्तन' — समरसता, कुटुंब, स्वदेशी, पर्यावरण और नागरिक कर्तव्य — एक नए और समर्थ भारत की नींव हैं।

संघ के शताब्दी वर्ष में हम सबका यह दायित्व है कि हम केवल वक्ता या श्रोता न बनें, बल्कि आचरण करने वाले नागरिक बनें।

आइए, हम डॉ. हेडगेवार जी के स्वप्न को साकार करने का संकल्प लें। राष्ट्र निर्माण के लिए उनका मंत्र था — व्यक्ति निर्माण।
यदि देश को महान बनाना है, तो ऐसे नागरिक तैयार करने होंगे जो अनुशासित हों, चरित्रवान हों और जिनके हृदय में राष्ट्र के प्रति निःस्वार्थ प्रेम हो।

पंच परिवर्तन केवल बदलाव की प्रक्रिया नहीं है, यह सर्वहित की भावना है — व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सबकी भलाई, सबकी उन्नति और समाज की सुरक्षा के लिए कार्य करना। व्यक्ति से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व तक भलाई का संदेश!

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः!

जब सभी ख़ुश होंगे, जब सभी स्वस्थ होंगे, तभी दुनिया सच में सुंदर, सुरक्षित और सशक्त बनेगी।

इन्हीं शब्दों के साथ, मैं अपनी वाणी को विराम देती हूँ।

जय हिन्द ।